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गृहस्थ जीवन वाले 6 सितंबर और वैष्णव संप्रदाय 7 सितंबर को जन्माष्टमी मनाएंगे

by Rajendra Joshi
September 4, 2023
in देहरादून
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देहरादून। डॉक्टर आचार्य सुशांत राज ने जानकारी देते हुये बताया की कृष्ण जन्माष्टमी हिंदू पंचांग के अनुसार हर साल भादो माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में मध्यरात्रि 12 बजे मथुरा में भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था। इस साल रक्षाबंधन पर जिस तरह दो तिथियों को लेकर असमंजस रहा, उसी तरह कृष्ण जन्माष्टमी को लेकर भी है।

कृष्ण जन्माष्टमी हिंदू धर्म में बहुत अधिक महत्व माना गया है। जन्माष्टमी के दिन भगवान कृष्ण के बाल रूप की पूजा का विधान है। इस दिन कृष्ण भक्त उपवास भी रखते हैं। मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। 6 और 7 सितंबर दोनों दिन श्री कृष्ण जन्मोत्सव मनाया जाएगा. गृहस्थ जीवन जीवन वाले 6 सितंबर और  वैष्णव संप्रदाय 7 सितंबर को जन्माष्टमी मनाएंगे. 6 सितंबर को भगवान श्री कृष्ण का 5250 वां जन्मोत्सव मनाया जाएगा. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में मध्यरात्रि यानी 12 बजे रात  को मथुरा में हुआ था. भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में यह त्योहार हर साल पूरे देश में पूर्ण हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है.

हिंदू धर्म में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार पूरे धूमधाम से मनाया जाता है। कृष्ण जन्माष्टमी जिसे जन्माष्टमी वा गोकुलाष्टमी के रूप में भी जाना जाता है, एक वार्षिक हिंदू त्योहार है जो विष्णुजी के दशावतारों में से आठवें और चौबीस अवतारों में से बाईसवें अवतार श्रीकृष्ण के जन्म के आनन्दोत्सव के लिये मनाया जाता है। यह हिंदू चंद्रमण वर्षपद के अनुसार कृष्ण पक्ष (अंधेरे पखवाड़े) के आठवें दिन (अष्टमी) को भाद्रपद में मनाया जाता है।यह एक महत्वपूर्ण त्योहार है, विशेषकर हिन्दू धर्म की वैष्णव परम्परा में। भागवत पुराण के अनुसार कृष्ण के जीवन के नृत्य-नाटक की परम्परा, कृष्ण के जन्म के समय मध्यरात्रि में भक्ति गायन, उपवास, रात्रि जागरण, और एक त्योहार अगले दिन जन्माष्टमी समारोह का एक भाग हैं। कृष्ण जन्माष्टमी के उपरान्त त्योहार नंदोत्सव होता है, जो उस अवसर को मनाता है जब नंद बाबा ने जन्म के सम्मान में समुदाय को उपहार वितरित किए। कृष्ण देवकी और वासुदेव आनकदुंदुभी के पुत्र हैं और उनके जन्मदिन को हिंदुओं द्वारा जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है, विशेष रूप से गौड़ीय वैष्णववाद परम्परा के रूप में उन्हें भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व माना जाता है।  जन्माष्टमी हिंदू परंपरा के अनुसार तब मनाई जाती है जब माना जाता है कि कृष्ण का जन्म मथुरा में भाद्रपद महीने के आठवें दिन की आधी रात को हुआ था। कृष्ण का जन्म अराजकता के क्षेत्र में हुआ था।  यह एक ऐसा समय था जब उत्पीड़न बड़े पैमाने पर था, स्वतंत्रता से वंचित किया गया था, बुराई सब ओर थी, और जब उनके मामा राजा कंस द्वारा उनके जीवन के लिए संकट था। श्रीकृष्ण जी भगवान विष्णु जी के अवतार हैं, जो तीनों लोकों के तीन गुणों सतगुण, रजगुण तथा तमोगुण में से सतगुण विभाग के प्रभारी हैं। भगवान का अवतार होने के कारण से श्रीकृष्ण जी में जन्म से ही सिद्धियां उपस्थित थी। उनके माता पिता वसुदेव और देवकी जी के विवाह के समय मामा कंस जब अपनी बहन देवकी को ससुराल पहुँचाने जा रहा था तभी आकाशवाणी हुई थी जिसमें बताया गया था कि देवकी का आठवां पुत्र कंस का अन्त करेगा। अर्थात् यह होना पहले से ही निश्चित था अतः वसुदेव और देवकी को कारागार में रखने पर भी कंस कृष्ण जी को नहीं समाप्त कर पाया। मथुरा के बंदीगृह में जन्म के तुरंत उपरान्त, उनके पिता वसुदेव आनकदुन्दुभि कृष्ण को यमुना पार ले जाते हैं, जिससे बाल श्रीकृष्ण को गोकुल में नन्द और यशोदा को दिया जा सके। जन्माष्टमी पर्व लोगों द्वारा उपवास रखकर, कृष्ण प्रेम के भक्ति गीत गाकर और रात्रि में जागरण करके मनाई जाती है। मध्यरात्रि के जन्म के उपरान्त, शिशु कृष्ण की मूर्तियों को धोया और पहनाया जाता है, फिर एक पालने में रखा जाता है। फिर भक्त भोजन और मिठाई बांटकर अपना उपवास पूरा करते हैं। महिलाएं अपने घर के द्वार और रसोई के बाहर छोटे-छोटे पैरों के चिन्ह बनाती हैं जो अपने घर की ओर चलते हुए, अपने घरों में श्रीकृष्ण जी के आने का प्रतीक माना जाता है। हिंदू जन्माष्टमी पर उपवास, भजन-गायन, सत्सङ्ग-कीर्तन, विशेष भोज-नैवेद्य बनाकर प्रसाद-भण्डारे के रूप में बाँटकर, रात्रि जागरण और कृष्ण मन्दिरों में जाकर मनाते हैं।  प्रमुख मंदिरों में ‘भागवत पुराण’ और ‘भगवद गीता’ के पाठ का आयोजन होता हैं। कई समुदाय नृत्य-नाटक कार्यक्रम आयोजित करते हैं जिन्हें रास लीला वा कृष्ण लीला कहा जाता है।  रास लीला की परम्परा विशेष रूप से मथुरा क्षेत्र में, भारत के पूर्वोत्तर राज्यों जैसे मणिपुर और असम में और राजस्थान और गुजरात के कुछ भागों में लोकप्रिय है। कृष्ण लीला में कलाकारों की कई दलों और टोलियों द्वारा अभिनय किया जाता है, उनके स्थानीय समुदायों द्वारा उत्साहित किया जाता है, और ये नाटक-नृत्य प्रत्येक जन्माष्टमी से कुछ दिन पहले आरम्भ हो जाते हैं। जन्माष्टमी उत्तर भारत के ब्रज क्षेत्र में सबसे बड़ा त्योहार है, मथुरा जैसे नगरों में जहाँ श्री कृष्ण भगवान का जन्म हुआ था, और वृन्दावन में जहाँ वह पले-बड़े थे। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, उत्तराखण्ड, हिमाचल और पंजाब के सभी नगरों और गाँवों में जन्माष्टमी विशेष रूप से मनाते हैं। हिन्दू मन्दिरों को सजाया और जगमगाया जाता है जो दिन में कई आगन्तुकों को आकर्षित करते हैं। बहुत से कृष्ण भक्त भक्ति कार्यक्रम आयोजित करते हैं और रात्रि जागरण करते हैं। अपने पारम्परिक रीति रिवाजों द्वारा उत्तराखंड में  जन्माष्टमी का उत्सव बड़े ही जोर शोर  के साथ मनाया जाता है।  केवल बड़ों के द्वारा ही नहीं बल्कि बच्चों द्वारा भी यह पर्व बड़े ही हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है। आज के दिन की शुरुवात सभी लोग सुबह स्नान करके नए कपड़ें पहन कर करते है। परम्परा के अनुसार सभी लोग अपने से बड़े का पैर छू कर आशीर्वाद प्राप्त करते है। उसके बाद पहले घर पर भगवान श्री कृष्ण की पूजा की जाती है और साथ अन्य देवी देवताओं की भी पूजा की जाती है। बाजारों में आज के दिन तरह तरह के फल आ जाते है सभी एक दिन पहले ही प्रसाद के  रूप में फल खरीद लेते है।

पक्ष की अष्टमी तिथि को श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। इस दिन भक्त व्रत रखकर भगवान कृष्ण के जन्म के बाद रात 12 बजे पूजा-अर्चना करते हैं। इस दिन को लड्डू गोपाल के जन्मदिन के रुप में भी मनाया जाता है। इस बार श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का शुभ मुहूर्त 6 सितंबर को रात 11:57 बजे से मध्य रात्रि 12:42 बजे तक मनाया जाएगा। जिसके चलते रात 11 बजकर 57 मिनट पर जन्माष्टमी पर पूजा शुरू हो सकेगी।

जन्माष्टमी 2023 तिथि  :- भाद्रपद कृष्ण जन्माष्टमी तिथि शुरू – 06 सितंबर 2023, दोपहर 03.37 

भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि समाप्त – 07 सितंबर 2023, शाम 04.14

जन्माष्टमी 6 या 7 सितंबर कब ?

6 सितंबर 2023 – गृहस्थ जीवन वालों को इस दिन जन्माष्टमी मनाना शुभ रहेगा. इस दिन रोहिणी नक्षत्र और रात्रि पूजा में पूजा का शुभ मुहूर्त भी बन रहा है. भगवान कृष्ण का जन्म रात में ही हुआ था. 

7 सितंबर 2023 – पंचांग के अनुसार इस दिन वैष्णव संप्रदाय के लोग जन्माष्टमी मनाएंगे. साधू, संत और सन्यासियों में कृष्ण की पूजा का अलग विधान है  और सन्यासियों में कृष्ण की पूजा का अलग विधान है  और इस दिन दही हांडी उत्सव भी मनाया जाएगा.

जन्माष्टमी 2023 पर रोहिणी नक्षत्र :-

रोहिणी नक्षत्र शुरू- 06 सितंबर 2023, सुबह 09:20

जन्माष्टमी 2023 शुभ मुहूर्त :-

श्रीकृष्ण पूजा का समय – 6 सितंबर 2023, रात्रि 11.57 – 07 सितंबर 2023, प्रात: 12:42

पूजा अवधि – 46 मिनट

मध्यरात्रि का क्षण – प्रात: 12.02

जन्माष्टमी 2023 व्रत पारण समय :- जिन लोगों के घर श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के समापन के बाद जन्माष्टमी व्रत का पारण होता है, वे देर रात 12:42 बजे  के बाद पारण कर लेंगे. वहीं जो लोग अगले दिन सुबह पारण करते हैं, वे 7 सितंबर को  सुबह 06:02 के बाद पारण करेंगे. जिनके यहां अष्टमी तिथि के समापन पर पारण होता है, वे 7 सितंबर को शाम 04:14  के बाद पारण करेंगे. जिनके यहां अष्टमी तिथि के समापन पर पारण होता है, वे 7 सितंबर को शाम 04:14 के बाद पारण करेंगे.

Tags: breaking news

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