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उत्तराखंड में जंगल के दुश्मनों पर ताबड़तोड़ कार्रवाई, चार महीने में 166 मामले दर्ज, आप न करें ये गलती

by Rajendra Joshi
July 7, 2026
in उत्तराखंड
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वन दारोगा संगठन ने कहा कई लोग अपने हित के लिए जंगलों में आग लगाते हैं, कुछ लोग आपसी रंजिश में भी जंगल जलाते हैं-

देहरादून:उत्तराखंड में जंगल के दुश्मनों पर ताबड़तोड़ कार्रवाई की गई है. आंकड़ों के हिसाब से देखे तो पिछले 4 महीनों के दौरान ही 166 मामले दर्ज कर लिए गए हैं. यह वह मामले हैं जिसमें शरारती तत्वों द्वारा जंगलों में आग लगाने की बातें सामने आई. जिसके बाद महकमे ने कड़ा कदम उठाकर ऐसे लोगों पर कार्रवाई शुरू की.

जंगल के दुश्मनों पर ताबड़तोड़ कार्रवाई:उत्तराखंड में जंगलों को आग के हवाले करने वाले लोगों के खिलाफ इस बार सख्ती का ऐसा अभियान चला है, जिसकी मिसाल पिछले कुछ सालों से ही देखने को मिली है. वनाग्नि की घटनाओं को लेकर लगातार उठ रहे सवालों और बढ़ती चिंताओं के बीच वन विभाग ने जंगल के दुश्मनों पर कार्रवाई का शिकंजा कसना शुरू किया है. यही वजह है कि बीते चार महीनों के दौरान प्रदेश में जंगलों में आग लगाने या आग लगने के लिए जिम्मेदार पाए गए लोगों के खिलाफ कुल 166 मामले दर्ज किए गए हैं.

गर्मी में बढ़ जाती हैं वनाग्नि की घटनाएं:दरअसल हर साल गर्मियों के मौसम के साथ उत्तराखंड के जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ जाती हैं. इन घटनाओं के पीछे मौसम, सूखी वनस्पतियां और तेज हवाएं अपनी भूमिका निभाती हैं, लेकिन विभागीय जांच और पिछले सालों के अनुभव बताते हैं कि जंगलों में लगने वाली अधिकांश आग के पीछे किसी न किसी स्तर पर मानवीय कारण जिम्मेदार होते हैं. इनमें लापरवाही से लेकर जानबूझकर आग लगाने तक के मामले शामिल रहते हैं.

वनाग्नि के लिए मानव गतिविधियां भी जिम्मेदार:फॉरेस्ट फायर सीजन के दौरान इस बार भी ऐसे कई मामले सामने आए, जिनमें वन विभाग ने जंगलों में लगी आग के पीछे मानव गतिविधियों को जिम्मेदार माना. कहीं घास उगाने के उद्देश्य से आग लगाई गई, तो कहीं शरारती तत्वों ने वन संपदा को नुकसान पहुंचाने के लिए जंगलों को आग के हवाले कर दिया. कुछ मामलों में ग्रामीणों की लापरवाही भी सामने आई, जिसके कारण छोटी आग ने बड़े क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया.

चार महीनो में 166 मामले दर्ज:इन्हीं घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए वन विभाग ने इस बार पहले से कहीं ज्यादा आक्रामक रणनीति अपनाई. विभागीय टीमें लगातार फील्ड में सक्रिय रहीं और आग लगने की हर घटना के पीछे जिम्मेदार लोगों की पहचान करने का प्रयास किया गया. परिणामस्वरूप बीते चार महीनों के दौरान कुल 166 ऐसे मामले दर्ज किए गए, जिनमें जंगलों में आग लगाने या आग लगने के लिए जिम्मेदारी तय करने की कार्रवाई की गई.-

वनों के दुश्मनों पर कानूनी शिकंजा:इनमें से 148 मामले सीधे वन विभाग द्वारा दर्ज किए गए, जबकि 18 मामलों में पुलिस विभाग में एफआईआर दर्ज करवाई गई. यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि विभाग अब केवल आग बुझाने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि आग लगाने वालों तक पहुंचकर उन्हें कानून के दायरे में लाने की रणनीति पर काम कर रहा है.

6 लोगों की हुई पहचान, एक मामला ट्रायल कोर्ट में:इन मामलों की जांच के दौरान छह लोगों की पहचान भी की गई है, जिन्हें जंगलों में आग लगने की घटनाओं से जोड़कर देखा गया है. इनमें से एक मामले में न्यायिक प्रक्रिया भी आगे बढ़ चुकी है और संबंधित प्रकरण फिलहाल ट्रायल कोर्ट में विचाराधीन है. विभागीय अधिकारियों का मानना है कि यदि ऐसे मामलों में दोषियों को सजा मिलती है, तो यह भविष्य में ऐसे अपराधों पर प्रभावी रोक लगाने में मददगार साबित होगा.

वन विभाग ने अर्थदंड भी लगाया:वन विभाग ने केवल मुकदमे दर्ज करने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि आर्थिक दंड की कार्रवाई भी शुरू की है. इस साल दो मामलों में दोषी पाए गए लोगों पर अर्थदंड लगाया गया, जिसके तहत कुल 14 हजार 500 रुपये की वसूली की गई. विभाग का मानना है कि आर्थिक दंड और कानूनी कार्रवाई का संयुक्त प्रभाव लोगों को जंगलों के प्रति जिम्मेदार व्यवहार अपनाने के लिए प्रेरित करेगा.

हालांकि अभी भी बड़ी संख्या में मामलों की जांच जारी है. आंकड़ों के अनुसार 146 मामलों की जांच वन विभाग के स्तर पर चल रही है, जबकि 17 मामलों की जांच पुलिस विभाग कर रहा है. इससे साफ है कि आने वाले समय में दर्ज मामलों और कार्रवाई की संख्या में और बढ़ोतरी हो सकती है.

वनाग्नि के पिछले 3 साल के आंकड़े:यदि पिछले तीन सालों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो तस्वीर और अधिक गंभीर दिखाई देती है. इस अवधि में वन विभाग ने वनाग्नि से जुड़े कुल 1,228 मामले दर्ज किए हैं, जबकि 74 मामलों में पुलिस विभाग में एफआईआर कराई गई है. यह बताता है कि जंगलों में आग की घटनाएं केवल प्राकृतिक कारणों का परिणाम नहीं हैं, बल्कि इनमें मानवीय हस्तक्षेप की भूमिका भी महत्वपूर्ण है.

2024 था सबसे चुनौतीपूर्ण:साल 2024 इस लिहाज से सबसे चुनौतीपूर्ण वर्ष साबित हुआ था. उस दौरान वन विभाग में 950 मामले दर्ज किए गए, जबकि 52 मामलों में पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई गई. वहीं वर्ष 2025 में स्थिति कुछ बेहतर दिखाई दी और वन विभाग ने 130 मामले दर्ज किए, जबकि केवल चार मामलों में पुलिस शिकायत दर्ज हुई.

2025 में 8 लोग चिन्हित हुए:दोषियों की पहचान के मामले में भी पिछले सालों के आंकड़े काफी महत्वपूर्ण हैं. साल 2024 में कुल 106 लोगों की पहचान ऐसी घटनाओं में संलिप्तता के आधार पर की गई थी. वहीं 2025 में आठ लोगों को चिन्हित किया गया. इससे यह स्पष्ट होता है कि विभाग की निगरानी प्रणाली लगातार मजबूत हुई है और संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने के प्रयास तेज हुए हैं.

आर्थिक दंड के मामलों में भी उल्लेखनीय अंतर देखने को मिला. साल 2024 में 10 मामलों में कुल 90 हजार रुपये का अर्थदंड लगाया गया था, जबकि 2025 में केवल एक मामले में 15 हजार रुपये का जुर्माना वसूला गया. इस साल अब तक दो मामलों में 14 हजार 500 रुपये की वसूली की जा चुकी है.

2026 में अब तक वनाग्नि की 580 घटनाएं:वनाग्नि के मोर्चे पर इस साल राहत की बात यह रही कि आग की घटनाओं में पिछले साल की तुलना में कमी दर्ज की गई. राज्य में इस साल कुल 580 वनाग्नि की घटनाएं सामने आईं, जिनमें लगभग 500.81 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ. हालांकि यह आंकड़ा कम जरूर है, लेकिन इसे पूरी तरह संतोषजनक नहीं कहा जा सकता क्योंकि आग की कई घटनाएं संवेदनशील और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सामने आईं.

विशेष चिंता की बात यह रही कि इस बार चारधाम यात्रा मार्ग और उससे जुड़े जिलों में आग की घटनाएं अधिक दर्ज की गईं. यात्रा सीजन के दौरान इन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और वाहनों की आवाजाही रहती है. ऐसे में छोटी सी चूक भी बड़े खतरे का कारण बन सकती है. यही वजह है कि विभाग को इन इलाकों में अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ी.

वनाग्नि के मामलों में गढ़वाल क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित दिखाई दिया. आंकड़ों के अनुसार कुमाऊं मंडल की तुलना में लगभग चार गुना अधिक जंगल गढ़वाल क्षेत्र में जले. इसका एक बड़ा कारण यहां का भौगोलिक स्वरूप, चीड़ के जंगलों की अधिकता और चारधाम यात्रा के दौरान बढ़ने वाली मानवीय गतिविधियां मानी जा रही हैं.

सीसीएफ का बयान:इस मामले में CCF वनाग्नि सुशांत पटनायक कहते हैं कि-

वन विभाग की तरफ से जंगलों में आग लगने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई के लिए उचित सख्ती दिखाई गई है. इसमें कई मामलों में जांच गतिमान है.
-सुशांत पटनायक, CCF वनाग्नि-

केवल सरकारी प्रयास नाकाफी:पंचायतों में काम कर चुके जोत सिंह कहते हैं कि केवल सरकारी प्रयासों के भरोसे वनाग्नि की घटनाओं को पूरी तरह नियंत्रित नहीं किया जा सकता. इसके लिए स्थानीय समुदायों, ग्राम सभाओं और आम नागरिकों की सक्रिय भागीदारी भी जरूरी है. जंगलों के आसपास रहने वाले लोगों को जागरूक बनाने और आग लगने की स्थिति में त्वरित सूचना देने की व्यवस्था को मजबूत करना समय की आवश्यकता है.

वन दारोगा संगठन का बयान:उधर दूसरी तरफ फील्ड स्तर पर काम करने वाले कर्मचारी कहते हैं कि-

फॉरेस्ट फायर सीजन के दौरान वन विभाग के कर्मचारियों के लिए काम करना बेहद ज्यादा मुश्किल हो जाता है और काफी परेशानियों के बावजूद भी जंगलों में आग बुझाने के लिए फील्ड कर्मी जुटे रहते हैं. इसमें कई वन कर्मियों की जान भी चली जाती है. कई लोग अपने हित के लिए जंगलों में आग लगाते हैं और कई शरारती तत्व ऐसे भी हैं, जो दूसरों के साथ आपसी रंजिश के कारण भी जंगलों में आग लगाने का काम करते हैं.
-स्वरूप चंद्र रमोला, प्रदेश अध्यक्ष, वन दारोगा संगठन-

25 लाख मुआवजे की मांग:स्वरूप चंद्र रमोला कहते हैं कि जिस स्थिति में वन विभाग के फील्ड कमी फॉरेस्ट फायर के दौरान काम करते हैं, ऐसे में उनकी जान को भी बेहद ज्यादा खतरा रहता है. इसीलिए पिछले लंबे समय से वनकर्मियों द्वारा ड्यूटी के दौरान मौत होने पर 25 लाख रुपए का मुआवजा दिए जाने की मांग की जा रही है, जिस पर अब तक कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है.

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