पंतनगर, 28 मार्च 2026। पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय में प्रसार शिक्षा निदेशालय एवं राष्ट्रीय जैविक खेती एवं प्राकृतिक खेती केन्द्र, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, गाजियाबाद के संयुक्त तत्वावधान में एक-दिवसीय क्षेत्रीय वृहत प्राकृतिक खेती परामर्श-सह-कार्यशाला का आयोजन विश्वविद्यालय के गांधी हॉल में किया गया। कार्यषाला में मुख्य अतिथि के रूप में विष्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर मनमोहन सिंह चौहान, विशिष्ट अतिथि के रूप में निदेशक, राष्ट्रीय जैविक एवं प्राकृतिक खेती केंद्र, गाजियाबाद डा. गगनेष शर्मा एवं निदेशक, विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा डा. लक्ष्मीकान्त के साथ सहायक निदेषक, राष्ट्रीय जैविक एवं प्राकृतिक खेती केंद्र, गाजियाबाद डा. वाचस्पति पाण्डेय; प्रगतिशील किसान डालचंद, अधिष्ठाता कृषि डा. सुभाष चन्द्रा, निदेशक षोध डा. एस. के. वर्मा एवं प्राध्यापक, प्रसार शिक्षा निदेशालय डा. निर्मला भट्ट मंच पर उपस्थित रहे। कार्यशाला के प्रारम्भ में प्राकृतिक खेती पर आधारित कृशि विज्ञान केन्द्रों द्वारा लगे स्टालों एवं डा. सुनीता टी पाण्डे द्वारा वृक्षायुर्वेद प्राकृतिक खेती केन्द्र पर लगाये गये प्रदर्षनों का अतिथियों द्वारा अवलोकन किया गया।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में कुलपति प्रोफेसर मनमोहन सिंह चौहान ने कहा कि विश्वविद्यालय के एलुमनाई देश-विदेश में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं, जिस पर हमें गर्व है। 1960 में स्थापित यह विश्वविद्यालय शिक्षा और कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में अग्रणी रहा है। यहाँ वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पारंपरिक ज्ञान के समन्वय पर विशेष बल दिया जाता है। कार्यालय में विभिन्न राज्यों से आए किसानों, विशेषज्ञों और युवाओं की भागीदारी कृषि के उज्ज्वल भविष्य का संकेत है। विष्वविद्यालय में शोध को अत्यधिक महत्व दिया जाता है, जिससे नई तकनीकें और नवाचार सामने आते हैं। उन्होंने कहा कि आज की मुख्य चुनौती किसानों की आय बढ़ाने, लागत घटाने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की है। रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों को देखते हुए अब समय है कि हम संतुलित और प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ें। आत्मनिर्भरता, वैज्ञानिक सोच और सतत खेती अपनाकर ही हम भविष्य की चुनौतियों का सामना कर सकते हैं। विष्वविद्यालय इस दिशा में प्रशिक्षण और मार्गदर्शन देकर किसानों के साथ खड़ा है। यह केवल एक कार्यषाला नहीं बल्कि एक साझा अभियान है-जिसका लक्ष्य सुरक्षित, टिकाऊ और लाभकारी खेती के साथ 2047 तक एक समृद्ध और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण है।
विशिष्ट अतिथि डा. गगनेष शर्मा ने कहा कि हरित क्रांति के बाद रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अधिक उपयोग से उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन मृदा की उर्वरता, ऑर्गेनिक कार्बन और सूक्ष्म जीवों में कमी आई, जिससे मिट्टी, जल स्रोत और मानव स्वास्थ्य प्रभावित हुए। इसलिए अब जैविक और प्राकृतिक खेती अपनाना आवश्यक है, जिसमें गोबर-गोमूत्र जैसे संसाधन मिट्टी की गुणवत्ता सुधारते हैं और लागत घटाते हैं। उन्होंने कहा कि बढ़ती लागत और सीमित उपलब्धता के कारण प्राकृतिक खेती भविष्य की जरूरत बन गई है। इस दिशा में देशभर में शोध केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं, और सरकार द्वारा नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग के माध्यम से किसानों को प्रशिक्षण व सहायता दी जा रही है। किसानों को छोटे स्तर से शुरुआत कर धीरे-धीरे पूरी खेती को प्राकृतिक पद्धति में बदलना चाहिए। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड जैसे क्षेत्रों में इसके लिए अनुकूल वातावरण है। साथ ही, युवाओं को जागरूक कर स्वस्थ खेती और जीवनशैली को बढ़ावा देना जरूरी है।
इस अवसर पर डा. लक्ष्मीकान्त ने प्राकृतिक खेती के व्यावहारिक पहलुओं पर चर्चा करते हुए कहा कि आज कृषि के सामने तीन मुख्य चुनौतियाँ हैं किसान की आय बढ़ाना, खेती की लागत घटाना और मृदा स्वास्थ्य को सुधारना। मिट्टी एक जीवित प्रणाली है, जिसमें सूक्ष्म जीव फसल उत्पादन को संतुलित रखते हैं। ‘वन हेल्थ’ की अवधारणा के तहत मानव, पशु, पर्यावरण और मृदा सभी का स्वास्थ्य महत्वपूर्ण है। रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित उपयोग से मृदा की गुणवत्ता प्रभावित हुई है। सही मात्रा में उर्वरक लाभकारी होते हैं, लेकिन अधिक उपयोग नुकसानदायक है। अब केवल खाद्य सुरक्षा नहीं, बल्कि पोषण सुरक्षा पर ध्यान देना आवश्यक है। जैविक और रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग से बेहतर उत्पादन और मृदा स्वास्थ्य संभव है। साथ ही, ब्रांडिंग और सर्टिफिकेशन के माध्यम से किसान अपने उत्पाद का बेहतर मूल्य प्राप्त कर सकते हैं। प्राकृतिक और टिकाऊ खेती को सफल बनाने के लिए तीन स्तंभ जरूरी हैंः वैज्ञानिक शोध, किसानों की भागीदारी और सरकारी सहयोग। इन तीनों के समन्वय से ही कृषि का स्थायी विकास संभव है। प्रगतिशील किसान डालचंद ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि प्राकृतिक खेती अपनाने से उनकी उत्पादन लागत में कमी आई है तथा फसलों की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। उन्होंने अन्य किसानों को भी इस पद्धति को अपनाने के लिए प्रेरित किया और अपने खेत पर किए गए प्रयोगों की जानकारी दी।
कार्यशाला के प्रारम्भ में निदेशक प्रसार शिक्षा डा. जितेन्द्र क्वात्रा ने सभी का स्वागत करते हुए कार्यशाला की रूपरेखा प्रस्तुत की। कार्यशाला के दौरान प्राकृतिक खेती जागरूकता कैलेंडर तथा प्राकृतिक खेती पर आधारित पुस्तक का विमोचन अतिथियों द्वारा किया गया। कार्यशाला के दौरान प्राकृतिक खेती पर प्रगतिशील कृषकों एवं विशेषज्ञों द्वारा विचार-विमर्श किया गया। साथ ही पंतनगर विश्वविद्यालय के अंतर्गत प्राकृतिक कृषि के अनुसंधान परिणाम के वैज्ञानिक पहलुओं पर जानकारी दी गयी। प्रतिभागियों के लिए प्रश्नोत्तरी सत्र का भी आयोजन किया गया, जिसमें किसानों की जिज्ञासाओं का समाधान विशेषज्ञों द्वारा किया गया। कार्यशाला के अंत में डा. निर्मला भट्ट ने सभी उपस्थितजनों का धन्यवाद दिया।
कार्यशाला में अधिक से अधिक संख्या में किसान, हितधारक, विद्यार्थी, वैज्ञानिकों के साथ महाविद्यालयों के अधिष्ठाता, निदेषकगण एवं संकाय सदस्य उपस्थित थे। इस कार्यशाला में उत्तराखण्ड राज्य के विभिन्न जनपदों से लगभग 800 कृषकों ने सहभागिता की।







