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रेडॉन गैस के बदलाव से क्या भूकंप का पता लग सकता है? 2013 केदारनाथ आपदा के भी मिले चौंकाने वाले फैक्ट्स

by Rajendra Joshi
July 9, 2026
in उत्तराखंड
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रेडॉन गैस से क्या भूकंप की भविष्यवाणी की जा रही है, इस पर वाडिया इंस्टीट्यूट ने बड़ी स्टडी की है. रिपोर्ट- रोहित कुमार सोनी.-

देहरादून:वैसे तो दुनिया में फिलहाल कोई ऐसा सिस्टम नहीं है जिससे भूकंप को लेकर भविष्यवाणी की जा सके. फिर भी कुछ तरीके हैं, जिनके आधार पर काफी हद तक भूकंप के बारे में समय से पहले पता किया जा सकता है. इसमें से एक है रेडॉन गैस. वैज्ञानिकों का मानना है कि किसी क्षेत्र में रेडॉन गैस के बढ़ने या घटना से भूकंप का पता लगाया जा सकता हैं. इसलिए आज कल किसी क्षेत्र में भूकंप के खतरे को भापने के लिएरेडॉन गैसपर ज्यादा ध्यान दिया जाता हैं.

इस परवाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजीने भी रिसर्च की है.वाडिया इंस्टीट्यूट की स्टडीथोड़ी अलग है, जिसमें2013 की केदारनाथ आपदाका भी ज्रिक है. वाडिया इंस्टीट्यूट की स्टडी क्या कहती है, और वहां से वैज्ञानिकों के क्या दावे हैं, इसके बारे में आपको विस्तार से बताते हैं.

रेडॉन एक रंगहीन, गंधहीन रेडियोधर्मी गैस है, जो मिट्टी और चट्टानों में यूरेनियम के टूटने से प्राकृतिक रूप से बनती है.

फिलहाल वैज्ञानिक किसी भी स्थान, समय और तीव्रता वाले भूकंप की कोई सटीक भविष्यवाणी करने में सक्षम नहीं है. वैसे दुनिया भर के वैज्ञानिक इस प्रयास में लगे हुए हैं कि कोई ऐसा तंत्र (सिस्टम) विकसित किया जाए, जिससे भूकंप के पूर्वनुमान का अंदाजा लग सके और बड़े जान-माल का नुकसान होने से बचाया जा सके, लेकिन वैज्ञानिकों को अभी तक इसमें कोई सफलता नहीं मिल पाई है.

वैज्ञानिकों की चुनौती:वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती भूगर्भ में करीब 100 किलोमीटर नीचे क्या हलचल हो रही है और वहां कितनी एनर्जी इकट्ठा हो रही है, इसका पता लगाना है. यही वजह है कि किस जगह पर, कब और कितने मेग्नीट्यूड का भूकंप आएगा, इसके पूर्वानुमान को लेकर वैज्ञानिकों को कोई सफलता नहीं मिली है.-

रेडॉन गैस पर स्टडी:इसके अलावा कई बार ऐसा देखा गया है किजिस क्षेत्र में भूकंप के झटके महसूस हुए हैं, उससे पहले उस क्षेत्र में रेडॉन गैस की मात्रा में बड़ा बदलाव आता है.जिसके चलतेभूकंप को रेडॉन गैस जोड़कर देखा जा रहाहै. हालांकि, इसको लेकर अभी कोई ठोस अध्ययन नहीं हुआ है, लेकिन वैज्ञानिक पूर्व में हुई तमाम घटनाओं को देखते हुए यह संभावना जाता चुके हैं कि भूकंप से पहले रेडॉन गैस की मात्रा उस क्षेत्र में कभी बढ़ जाती है तो कभी घट जाती है. हालांकि, इस पर अभी भी वैश्विक स्तर पर अध्ययन किया जाना बाकी है.-

स्टडी में इस बात का पता चला है कि रेडॉन के असामान्य स्तर और भूकंप के बीच कोरिलेशन देखा गया है, लेकिन वैज्ञानिक अभी तक केवल इस डेटा के आधार पर सटीक समय, स्थान और तीव्रता की भविष्यवाणी करने में सक्षम नहीं हैं. इसका मुख्य कारण यह है कि रेडॉन के स्तर में बदलाव भूकंप के अलावा स्थानीय भूविज्ञान और मौसम संबंधी कारकों (जैसे तापमान, दबाव और वर्षा) से भी प्रभावित होता है.

वाडिया के वैज्ञानिकों का स्टडी:वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी देहरादूनने रेडॉन गैस के रिसाव को लेकर अध्ययन किया है, जिसमें कुछ अलग तथ्य निकलकर सामने आए है. वाडिया की स्टडी में चौकान वाला तथ्य यह है कि धरती में रेडॉन गैस में बढ़ना या घटना सिर्फ भूकंप के दौरान ही देखने को नहीं मिला, बल्किसाल 2013 में केदारनाथ में आई आपदाके दौरान भी उस क्षेत्र में रेडॉन गैस की मात्रा काफी अधिक बढ़ गई थी.

दरअसल, वाडिया इंस्टीट्यूट के भू वैज्ञानिक डॉ नरेश कुमार की ओर से किए गए अध्ययनAssessment of Hydrological Impact on Radon Data of MPGO, Ghuttu, During Kedarnath Flash Flood in Garhwal Himalaya, Implications for Earthquake Precursorरिपोर्ट पिछले महीनेGeophysics for Advancing Seismologyमें पब्लिश हुई है.-

2013 केदारनाथ आपदा के दौरान रेडॉन गैस का डाटा:भू वैज्ञानिक डॉ नरेश कुमार के अनुसार,केदारनाथ के पास गुत्तू रीजनमें कुछ विशेष सेंसर और मॉनिटरिंग उपकरण लगाए गए हैं, वहीं से उन्हेंरेडॉन गैस का डाटामिला है, जिससे यह पता चला है किसाल 2013 में आई भीषण आपदाके दौरान उस क्षेत्र में रेडॉन गैस कीऔसत मात्रा स्टैंडर्ड डेविएशन के दोगुने की सीमा को पार कर गई थी.ये डाटा केदारनाथ में 16-17 जून 2013 को आई आपदासे जुड़ा हुआ है.

केदारनाथ क्षेत्र में 52 घंटे तक लगातार बारिश हुई थी:केदारनाथ आपदा के दौरान वहां मिले रिकार्ड जैसेपानी की ऊंचाई और रेडॉन गैस के स्तर असामान्य रूप से बदल गए थे. दरअसल, केदारनाथ क्षेत्र में15 से 17 जून 2013 के बीच करीब 52 घंटे तक लगातार भारी बारिश हुई थी.

Geophysical Parameters पर पड़ा असर:लगातार हो रही भारी बारिश के कारण सतह पर जमा पानी बड़े पैमाने पर बढ़ गया और वोतेज बहाव (फ्लैश फ्लड)में बदल गया, जिसके चलते गुत्तू में स्थित एक 68 मीटर गहरे बोरहोल में बारिश के दौरान पानी का स्तर अचानक और तेजी से बढ़ा. केदारनाथ आपदा के दौरान वैज्ञानिकों के पास जो रिकॉर्ड आए है, उससे ये पूरी घटना साफ होती है. पानी की इतनी बड़ी मात्रा में वृद्धि ने अन्यभू-भौतिक पैरामीटरों (Geophysical Parameters)पर भी असर डाला.-

पानी की मात्रा बढ़ने से ग्राउंड वाटर में रेडॉन का स्तर बढ़ा:केदारनाथ में Geophysical Parameters के बदलने के कारण ही उस क्षेत्र में रेडॉन गैस के स्तर में भी असामान्य बदलाव देखा गया. बोरहोल के भीतर पानी की मात्रा बढ़ने से ग्राउंड वाटर में रेडॉन का स्तर बढ़ गया.

वहीं, बरसात के दौरान गहरी जल प्रवृत्ति (गहरे हिस्से में बहने वाली विशाल जल धाराएं, यह सतह पर चलने वाली हवाओं से नहीं, बल्कि पानी के घनत्व (Density) में बदलाव के कारण चलती हैं), मिट्टी में जमा गैस (soil gas) रेडॉन को नीचे की ओर ले गई, जिससे मिट्टी में रेडॉन गैस का स्तर कम हो गया.

आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चला कि फ्लैश फ्लड के दौरान रेडॉन काउंट्स औसत मान से दो गुना से अधिक तक पहुंच गया था, जो एक असामान्य प्रक्रिया थी. Power Spectrum Analysis और Residual Radon Data के बीच बारिश के समय अच्छा कोरिलेशन (Correlation) मिला. इससे साफ हुआ कि बारिश और भूजल के असर को हटाकर रेडॉन में असामान्य गतिविधि का आकलन करना संभव है.

दूसरे शब्दों में कहे तो रेडॉन मॉनिटरिंग जब सिस्मिक और वॉटर लेवल डेटा के साथ मिलती है, तो भूकंप के शुरुआती संकेतों का पता लगाने में मदद कर सकती है. क्योंकि भूकंप का अनुमान लगाने के लिए रेडॉन का इस्तेमाल करने में एक बड़ी चुनौती टेक्टोनिक एक्टिविटी से होने वाले बदलावों को पानी या मौसम की स्थिति से होने वाले बदलावों से अलग करना है.

रेडॉन एक रेडियो एक्टिव गैस है. ऐसे में जहां पर यूरेनियम और थोरियम के सोर्स होते हैं, वहां ये रेडॉन गैस निकलती है. अमूमन यह देखा गया है कि भूकंप से पहले रेडॉन गैस की मात्रा बढ़ जाती है या फिर घट जाती है. इसके प्रमाण गोरखा नेपाल भूकंप (अप्रैल 2015 में नेपाल में आया भूकंप) के दौरान भी देखने को मिला था. इसको लेकर पिछले 50 सालों से अध्ययन किया जा रहा है. इसको विश्व भर में अर्थक्वेक प्रिडिक्शन या अर्थक्वेक प्रिकर्सर (Earthquake Precursor) से काफी अधिक कोरिलेट किया गया है.
– डॉ नरेश कुमार, भू-वैज्ञानिक, वाडिया इंस्टीट्यूट –

वाडिया इंस्टीट्यूट की ओर सेसाल 2007 में गुत्तू में मल्टी पैरामीट्रिक जियोफिजिकल ऑब्जर्वेटरी लगाई गई थी, जहां से रेडॉन के साथ ही तमाम अन्य जानकारियां एकत्र की गई है, जिसकी लगातार मॉनिटरिंग की जा रही है. इसको लगाने का उद्देश्य ही था कि अर्थक्वेक प्रिडिक्शन (Earthquake Prediction) किया जा सके. हालांकि, जब डाटा को अध्ययन किया गया तो पता चला कि रादों (रेडॉन) गैस सिर्फ अर्थक्वेक प्रेडिक्शन के लिए नहीं है, बल्कि सरफेस पर होने वाले वैरिएशन से भी संबंधित है.

रेडॉन एक मूवेबल गैस है:साल 2013 में केदारनाथ घाटी में आपदा के दौरान उस क्षेत्र में रेडॉन गैस की मात्रा काफी अधिक बढ़ गई थी. अध्ययन में पता चला कि आपदा के दौरान पानी में रेडॉन गैस की मात्रा काफी अधिक बढ़ गई थी, जबकि मिट्टी में रेडॉन गैस की मात्रा घट गई थी. ऐसे में इस अध्ययन से निष्कर्ष निकला है कि रेडॉन एक मूवेबल गैस है, जो पानी के साथ मूव हो जाती है. यही वजह है कि आपदा के दौरान रेडॉन गैस की मात्रा बढ़ गई थी. ऐसे में रेडॉन गैस को सिर्फ अर्थक्वेक तक ही सीमित नहीं रखा जा सकता बल्कि टेक्टॉनिक फॉल्ट, मिट्टी की प्रॉपर्टी जानने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.

इसके अलावा यह भी देखने की जरूरत है कि रेडॉन गैस की मात्रा, अर्थक्वेक की वजह से बड़ी या घटी है या फिर किसी अन्य वजह से रेडॉन गैस की मात्रा में बदलाव हुआ है. ऐसे में अगर रेडॉन गैस को भूकंप से जोड़ना है तो अन्य तमाम पैरामीटर को ध्यान में रखते हुए कोरिलेट करना होगा.

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