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धार्मिक आधार पर बहुसंख्यक आबादी को राजनैतिक सत्ता के समर्थन हेतू तैयार किया जानाः एक स्वतंत्र लेख।

by Rajendra Joshi
June 6, 2025
in संपादकीय
0
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राजेन्द्र जोशीः भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है जो विविधता, सहिष्णुता तथा लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित है। भारत की धरती पर अनेकों धर्म, जाति, संप्रदाय, मतों को मानने वाले लोग सैकड़ों वर्षों से एक साथ रहते आये हैं परन्तु हालिया वर्षों में देखा गया है कि भारत की राजनीति में सत्ता पाने या सत्ता पर बने रहने के लिए विशेषतः धार्मिक बहुसंख्यक आबादी को एक औजार के रूप में इस्तेमाल हो रहा है और इस लक्षित धार्मिक बहुसंख्यक आबादी पर धार्मिक व राजनैतिक आधार पर विशेष राजनैतिक विचारधारा से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
स्वतंत्रता संग्राम के समय में महात्मा गांधी ने धर्म जैसे विषय को नैतिकता से जोड़ा तथा धर्म के राजनैतिक इस्तेमाल से दूर रखा जिस पर देश की आजादी के बाद की ‘ाुरूआती सरकारों ने अमल किया किन्तु कालांतर में अनेकों राजनैतिक पार्टियों ने धर्म को वोटबैंक के रूप में उपयोग किया प्रतिक्रिया स्वरूप सरकार ने संविधान के मूल पाठ में ‘‘धर्मनिरपेक्ष’’ ‘ाब्द को जोड़ा लेकिन व्यवहारिक राजनीति में धर्मनिरपेक्षता का आभाव ही देखने को मिला, जो वर्तमान में शिखर पर है। वर्तमान समय में धर्म एक निजी विश्वास और सांस्कृतिक पहचान से ज्यादा एक राजनैतिक हथियार बन चुका है जिसके चलते सभी पार्टियों द्वारा मंदिर, मस्जिद, गिरजाघरों व अन्य धार्मिकस्थलों को आगे रखकर धार्मिक ध्रुवीकरण किया जा रहा हैं तथा अल्पसंख्यक धर्म के लागों को अन्य बताकर ‘धर्म खतरे में है’ जैसे भावनात्मक नारों से सत्ता के लिए संघर्ष किया जा रहा है।
धार्मिक केन्द्रों के प्रतिनिधियों के द्वारा विशेष विचारधारा वाले राजनैतिक दल अथवा व्यक्ति के समर्थन में धर्म के नाम पर संप्रदाय विशेष को जुटाकर धार्मिक मंचों को राजनैतिक दलों के साथ साझा करना, जोकि हमारे समाज में धर्म को विश्वास के विषय से ज्यादा राजनैतिक विषय के रूप में दिखाने प्रयास कर तथा मोजो (मोबाइल संचार) व मीडिया के माध्यम से अनेक राजनैतिक भावनात्मक नारों से विशेष धर्म से आस्था रखने वाले लोगों के ध्रुवीकरण करने का एक प्रयास निरंतरता से होता रहता है जो कि एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए बेहद हानिकारक है।
इस गंभीर विषय के समाधान के लिए पूरे समाज, सरकार तथा अन्य संस्थाओं द्वारा धरातल पर शिक्षा तथा राजनैतिक साक्षरता का प्रसार-प्रसार के साथ धर्म और राजनीति की सीमाएं तय की जाने की आवश्यकता है, ताकि भारतीय लोकतंत्र का प्रत्येक वोटर सत्ता का चयन करते समय भावनात्मक व धार्मिक प्रलोभनों का शिकार ना बने तथा एक समावेशी और विविधता युक्त संस्कृति में लोकतंत्र सरकारों का गठन हो सके।

Tags: breaking newslatest news

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